
रिपोर्ट/आलोक गुप्ता
‘कॉमर्शियल ऑटो पर नहीं चलेगा उपभोक्ता कानून’, आयोग बोला ‘ड्राइवर रखे तो कारोबार माना जाएगा’- फाइनेंस कंपनी जीती केस
बरेली जिला उपभोक्ता आयोग ने लोन और नीलामी से जुड़े एक बड़े केस में सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने साफ कर दिया कि अगर गाड़ी कमाने के लिए खरीदी गई है तो उपभोक्ता कानून के तहत मुआवजा नहीं मिलेगा। रामायण ऑटो फाइनेंस के खिलाफ दायर 4.70 लाख रुपये की मांग वाली याचिका को आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया।
‘उम्र आड़े आई तो बेटे के नाम लिया लोन’..
भिण्डोलिया के निसार ने आयोग में शिकायत दी थी। निसार का कहना था कि ज्यादा उम्र के कारण कंपनी ने उन्हें लोन नहीं दिया। मजबूरन बेटे मो. साजिद के नाम पर दो ऑटो फाइनेंस कराए। दो ड्राइवर रखकर ऑटो चलवाए और कुछ समय तक किस्त भी जमा की। बीमारी के चलते किस्त टूट गई तो कंपनी ने बिना नियम के दोनों ऑटो नीलाम कर दिए। निसार ने कोर्ट से 4 लाख रुपये गाड़ियों के और 70 हजार रुपये मानसिक परेशानी के मांगे थे।
‘शिकायतकर्ता ने लोन लिया ही नहीं’ : कंपनी का तर्क..
फाइनेंस कंपनी के वकील सिद्धांत गुप्ता ने दलील दी कि पूरा लोन साजिद के नाम पर था। निसार का कंपनी से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। इसलिए निसार उपभोक्ता की श्रेणी में ही नहीं आते। कंपनी ने बताया कि कई महीने से किस्त नहीं आई। दिए गए चेक भी बाउंस हो गए। इस मामले में धारा-138 का केस पहले से कोर्ट में चल रहा है। नीलामी से पहले कंपनी ने पूरा नोटिस भेजा था।
‘दो ड्राइवर रखना = व्यवसायिक इस्तेमाल’ : आयोग का तर्क
आयोग अध्यक्ष दीपक कुमार त्रिपाठी और सदस्य दिनेश कुमार गुप्ता की बेंच ने फैसला कंपनी के हक में दिया। आयोग ने कहा कि पहला, लोन एग्रीमेंट साजिद और कंपनी के बीच है। पिता निसार का इसमें कोई कानूनी हक नहीं बनता। दूसरा, खुद शिकायतकर्ता ने माना कि ऑटो चलाने के लिए दो ड्राइवर रखे थे। इसका मतलब गाड़ी निजी नहीं, बल्कि कारोबार के लिए थी। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 व्यवसायिक खरीद पर लागू नहीं होता।
आयोग ने पाया कि किस्त डिफॉल्ट और चेक बाउंस की बात सही है। सभी सबूत देखने के बाद शिकायत को आधारहीन बताकर खारिज कर दिया। साथ ही दोनों पक्षों को अपना केस खर्च खुद उठाने का आदेश दिया।