लखनऊ – उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन में अवैध रूप से विराजमान भारतीय प्रशासनिक सेवा के अनुभवहीन अधिकारियों ने कुछ ऐसा मायाजाल रचा कि किसी को कुछ पता ही नहीं चला कि कैसे इन बड़का बाबूओ ने पावर कॉरपोरेशन से लेकर सरकार तक को गुमराह कर दिया। अगर इसका यानि पावर कारपोरेशन का और उसकी सहयोगी कंपनियों का विधिवत ऑडिट कराया जाए तो इससे बड़ा घोटाला भारतीय इतिहास में कोई नहीं होगा एक उदाहरण के तौर पर बिजली खरीद करता है। *पावर कॉरपोरेशन एग्रीमेंट करता है, डिस्ट्रीब्यूशन करने वाला डिस्काम और फिर पेमेंट करता है पावर कॉरपोरेशन, जो कंपनी है ही नहीं। सारे वित्तीय अधिकार पावर कार्पोरेशन के पास कैसे है और जिसके पास ताकत है उसके पास कुछ भी नहीं है।* जो संस्था अपने खर्चे तक के लिए दूसरे के ऊपर आश्रित है वह कैसे नीतिगत निर्णय ले सकती है? मान लीजिए कि आपके पास एक घर है आपने उसके पांच टुकड़े करके किसी को बेच दिया, अब क्या 14 साल बाद फिर आप जाकर उस घर पर यह कह सकते हैं कि इन पांच टुकड़ों में से इन दो टुकड़ों को मैं फिर से बेचूगाँ,
जो बात सामान्यतः नहीं हो सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन में यह हो रही है और उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा है राज्य सरकार को कुछ मालूम नहीं है, मंत्री को कुछ मालूम नहीं है क्योंकि इनको तो नियम कानून भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही बताएंगे और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी क्यों चाहेंगे की उनका यह बड़ा घोटाला खुलें इसलिए ना मंत्री को पता ना सरकार को पता उन्हें तो बस कर्मचारी और अभियंताओं के खिलाफ भड़काया ही जा रहा है और जनता के पैसे की खुली लूट का पूरा फार्मूला तैयार किया जा चुका है एक मायाजाल तैयार है । कर्मचारी/अभियंता अपनी बात किसे कहें कोई सुनने को तैयार नहीं है बस करोड़ों रुपए के संसाधन , लाइनों , परिवर्तकों , सब स्टेशनो, बड़ी बड़ी इमारतें जिनकी कीमत करोड़ में है व बेशकिमती ज़मीनों को टके के भाव में निजी कंपनियों को दिए जा रहे हैं करोड़ों की जमीन है एक रुपए सालाना किराया मात्र पर निजी संस्थाओं को दी जा रही है
आज तक अभियंताओं और अधिकारियों को उनकी असली ताकत का पता नहीं है क्योंकि कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने ऐसा मायाजाल फैलाया है कि सबको यही लगता है कि कहीं बर्खास्त ना कर दे या अन्य कोई कार्यवाही का डर दिखाकर सबको शांत कर रखा है, इससे पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी जो कि अध्यक्ष थे और आज नियुक्ती व कार्मिक विभाग के सर्वेसर्वा है उन्होंने बहुत से अभियंताओं को सेवा से बर्खास्त कर दिया जबकि उनके पास सेवा से बर्खास्त करने का कोई अधिकार ही नहीं था लेकिन जानकारी के अभाव की वजह से बहुत से लोग आज भी अपने आप को बर्खास्त समझ रहे हैं अगर यह लोग माननीय उच्च न्यायालय की शरण में जाकर उनके अधिकार को चुनौती दे दे तो भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों के समझ में आ जाएगा कि राज्य सरकार को तो गुमराह कर सकते हैं परन्तु न्यायालय को कैसे गुमराह करेंगे?
वहां तो इनकी सारी कलई खुल जाएगी कि बिना किसी अधिकार के इतने दिन सरकार को व जनता को गुमराह करके भ्रष्टाचार फैलाने की क्या सजा होती है?
आज तक कोई भी ऐसा अभियंता या कर्मचारी नहीं दिखाई दिया जो कि इन भारतीय प्रशासन सेवा के अधिकारियों को ललकार सके, जिसकी वजह से उनके हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि हजारों करोड़ों की संपदा को यह कौड़ियों के भाव में बेचना चाह रहे हैं। अब जब संयुक्त संघर्ष समिति इसका विरोध कर रही है तो सरकार को गुमराह करके एस्मा लागू करा देते है
यह भारतीय प्रशासनिक सेवा के दमनकारी नीतियां है और नहीं तो क्या है जिसकी वजह से इनके आगे विरोध में कोई भी ना खड़ा हो पाए और इनको लूट की पूरी छूट मिल जाए इनका मुंह चांदी के जूते से सूजता रहे चाहे हजारों कर्मचारियों के घरों के चूल्हे बुझ ही क्यों ना जाए और प्रदेश की उन्नति की रफ्तार ही क्यों ना मन्द पड़ जाए। उद्योगपति, किसान व गरीब जनता को इनकी यह मनमानी कितनी ही भारी क्यों ना पड़ जाये, पूर्वांचल और दक्षिणांचल की गरीब जनता और किसानों को इनकी मनमानी तबाह कर देगी और प्रदेश में फिर से अशान्ति छा जाएगी।
इन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को अगर मनमर्जी करने की छूट दे दी जाए तो यह पीडब्ल्यूडी , स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन ऐसे सभी विभागों को निजी हाथों में सौंप दे।
क्या जनता इसीलिए सरकारें चुनती है क्या इसीलिए जनता इतना टैक्स भर्ती है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उनके चुने प्रतिनिधियों को गुमराह कर के जनता को मूलभूत सेवाओ से भी वन्चित दिया जा रहा है। लेकिन यह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भूल गए हैं कि पत्रकार जो की स्थाई विपक्ष होता है उनके सारे काले कारनामे को जानता है और वक्त आने पर जनता व सरकार के सामने प्रस्तुत करता है और फिर सरकार से जवाब मांगता है

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