डॉ तनु जैन सीईओ बरेली कैंटोनमेंट बोर्ड..


(भारत की आध्यात्मिक चेतना की ओर एक दिव्य यात्रा)
गुवाहाटी/असम। नीलाचल पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या धाम केवल एक तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि भारत की जीवित आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। हाल ही में हुई एक आध्यात्मिक यात्रा के दौरान श्रद्धालु ने इस शक्ति पीठ की दिव्य ऊर्जा, तांत्रिक परंपरा और आत्मिक अनुभूति को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया।
शनिवार की सुबह असम की ओर रवाना हुई यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक रूपांतरण की ओर एक कदम थी। नीलाचल पर्वत परिसर में प्रवेश करते ही वातावरण में एक विशेष शांति और दिव्यता का अनुभव हुआ। कामाख्या सरोवर के समीप साधु-संत गहन तपस्या और मौन साधना में लीन दिखाई दिए, जो भारत की प्राचीन तपोभूमि परंपरा की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर रहे थे।
स्थानीय विद्वानों द्वारा संकलित ग्रंथों में कामाख्या पीठ के तांत्रिक रहस्यों, इसके ऐतिहासिक महत्व और प्राचीन असम नगरी प्राग्ज्योतिषपुर की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिव पुराण और कालिका पुराण में वर्णित कथा के अनुसार माता सती का योनि अंग इसी स्थल पर गिरा था, जिसके कारण कामाख्या को सृजन, उर्वरता और जीवन शक्ति का केंद्र माना जाता है।
गर्भगृह में प्रवेश के दौरान श्रद्धालुओं ने गहन आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव किया। यहां कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि शक्ति का निराकार स्वरूप प्रतिष्ठित है। निरंतर प्रवाहित जलधारा को जीवन चक्र का प्रतीक माना जाता है। यह स्थल स्त्री ऊर्जा के मूल स्रोत के रूप में जाना जाता है।
यात्रा के दौरान महा गणपति पूजन, हवन और कामेश्वर भैरव के दर्शन भी किए गए। मंदिर परिसर में स्थित माँ बगलामुखी और पर्वत शिखर पर विराजमान माँ भुवनेश्वरी के दर्शन से आध्यात्मिक ऊर्जा और गहन हुई। शिखर पर साधकों को जप और ध्यान में लीन देखा गया, जहां वातावरण अत्यंत शांत और दिव्य प्रतीत हुआ।
यात्रा के समापन पर श्रद्धालु ने नए वर्ष के लिए क्षमा, आत्मबल, विनम्रता और जागरूकता की प्रार्थना की। विदाई के समय वातावरण में केवल एक ही मंत्र गूंज रहा था—
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कामाख्यै नमः”
यह यात्रा एक स्मृति नहीं बल्कि आत्मा को छू लेने वाली जीवंत अनुभूति बनकर हृदय में अंकित हो गई। कामाख्या धाम आज भी भारत की आध्यात्मिक शक्ति, संस्कृति और चेतना का अमिट प्रतीक बना हुआ है।