बदायूं। चराग़-ए-सुख़न संस्था की ओर से मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया जिसमें शायरों ने अपनी बेहतरीन ग़ज़लों से समां बांध दिया।
नात-ए-पाक से मुशायरे के आगाज़ के बाद सभी शायरों ने दिए गए मिसरा ए तरह- “हर शख़्स यहां आईना किरदार नहीं है।” पर बेहतरीन अशआर पेश कर खूब दाद पाई।
उस्ताद शायर सुरेन्द्र नाज़ ने कहा-
उगते हुए सूरज को है प्रणाम सभी का,
ढलते हुए सूरज को नमस्कार नहीं है।
वरिष्ठ शायर सादिक़ अलापुरी ने फरमाया-
गर पास तेरे ख़ुल्क़ की तलवार नहीं है,
ये जान ले तू साहिबे किरदार नहीं है।
अल्हाज आज़म फरशोरी ने सुनाया-
बे खौफ उसे छूके गुजरते हैं सभी लोग,
जिस फूल के पहलू में कोई खार नहीं है।
शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने ग़ज़ल सुनाई-
जैसा हसीं मंज़र यहां सरहद के इस पार,
वैसा हसीं मंज़र मियां उस पार नहीं है।
समर बदायूंनी ने ग़ज़ल पढ़ी-
माना कि दग़ाबाज़ों की दुनिया है ये लेकिन,
ऐसा भी नहीं, कोई वफ़ादार नहीं है।
अरशद रसूल ने कहा कि –
बिक जाते हैं लाखों में यहां लोग टके के,
अब कुछ भी, नए दौर में बेकार नहीं है।
कुमार आशीष ने कुछ यूं कहा-
मुझको ये पता है कि फ़रिश्ता नहीं हूँ मैं,
है कौन जो दुनिया में गुनाहगार नहीं है?
उज्ज्वल वशिष्ठ ने कहा –
हाथों में जिसके कोई चमत्कार नहीं है
दुनिया ये उसे करती नमस्कार नहीं है।
मुशायरे के अंत में सभी की रजामंदी से अगला मासिक मुशायरा आगामी 17जनवरी को होना तय हुआ जिसका मिसरा तरह है – अब और क्या कहे कोई अपनी ‘ज़बान’ से।
संचालन कर रहे अरशद रसूल ने सभी का आभार व्यक्त किया।
