रमजान के पाक महीने में हिंदू पर्व पर सम्मान का अनोखा संगम

बदायूँ की सियासत में सौहार्द की नई पहल

बदायूँ। रंगों के पर्व होली पर जहां एक ओर पूरा शहर उत्सव के रंग में रंगा नजर आया, वहीं पूर्व मंत्री एवं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव आबिद रजा ने एक ऐसी पहल कर दी, जिसने सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सौहार्द की नई इबारत लिख दी। मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले आबिद रजा ने इस बार होली के अवसर पर शहर के दर्जनों मंदिरों के पुरोहितों को नए वस्त्र भेंट कर सर्वधर्म समभाव की अनूठी मिसाल पेश की।

रमजान के पवित्र माह में हिंदू पर्व होली पर मंदिरों के पुजारियों का सम्मान कर उन्होंने यह संदेश दिया कि त्योहार केवल किसी एक धर्म या समुदाय के नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक एकता और आपसी प्रेम के प्रतीक होते हैं। उनकी इस पहल की शहरभर में चर्चा है और इसे सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मंदिरों में पहुंचकर किया सम्मान

पूर्व मंत्री आबिद रजा ने नगला देवी शक्ति पीठ मंदिर, हरप्रसाद मंदिर, बिरुआ बॉडी मंदिर, गौरीशंकर मंदिर समेत शहर के छोटे-बड़े दर्जनों मंदिरों में पहुंचकर वहां के पुरोहितों को वस्त्र भेंट किए। इस दौरान उन्होंने पुरोहितों का माल्यार्पण कर सम्मान भी किया और होली की शुभकामनाएं दीं। मंदिरों में मौजूद श्रद्धालुओं ने भी इस पहल की सराहना की और इसे भाईचारे का प्रतीक बताया।
पुरोहितों ने कहा कि इस तरह का सम्मान न केवल उनके लिए गौरव की बात है, बल्कि यह समाज में सकारात्मक संदेश देने वाला कदम है। उन्होंने पूर्व मंत्री के इस प्रयास को धार्मिक समरसता को बढ़ावा देने वाला बताया।

वर्षों से निभा रहे हैं सौहार्द की परंपरा

यह पहला अवसर नहीं है जब आबिद रजा ने सामाजिक एकता का परिचय दिया हो। इससे पूर्व भी वे वर्षों से श्रीराम बारात शोभायात्रा मार्ग पर लाल कारपेट बिछवाते रहे हैं और शिविर लगाकर स्वागत करते रहे हैं। सावन के महीने में कांवड़ यात्रियों के लिए भंडारे का आयोजन कर सेवा भाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर शहर के प्रमुख चौराहों पर रंगोली बनवाने की परंपरा भी उन्होंने शुरू कराई। संत गाडगे जयंती, वाल्मीकि जयंती समेत विभिन्न हिंदू पर्वों और आयोजनों में वे सक्रिय सहभागिता निभाते रहे हैं। वहीं अपने धर्म के त्योहारों—रमजान, ईद, मिलादुन्नबी या अन्य धार्मिक जुलूसों—में भी वे समान उत्साह और सम्मान के साथ भागीदारी करते हैं।

राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक संदेश

बदायूँ की सियासत में अक्सर आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक खींचतान देखने को मिलती रही है, लेकिन आबिद रजा की यह पहल राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर सामाजिक संदेश देने वाली मानी जा रही है। शहर में यह चर्चा भी रही कि अब तक किसी जनप्रतिनिधि ने होली या दीपावली के अवसर पर मंदिरों के पुरोहितों को इस प्रकार सम्मानित करने की पहल नहीं की थी।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि त्योहारों पर जनप्रतिनिधियों की सक्रियता अक्सर मंचों और औपचारिक बधाइयों तक सीमित रहती है, लेकिन मंदिरों में जाकर पुरोहितों को वस्त्र भेंट करना एक अलग और सकारात्मक सोच को दर्शाता है। इससे यह संदेश जाता है कि समाज के हर वर्ग और हर धर्म के लोगों का सम्मान समान रूप से किया जाना चाहिए।

सर्वसमाज के लीडर के रूप में पहचान

शहर में आबिद रजा की पहचान लंबे समय से सर्वसमाज के लीडर के रूप में रही है। वे हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के आयोजनों में समान रूप से भागीदारी करते हैं। धार्मिक जुलूसों में स्वागत द्वार बनवाना, लाल कारपेट बिछवाना और सेवा शिविर लगवाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है।
समाज के विभिन्न वर्गों का मानना है कि इस तरह की पहलें वर्तमान समय में विशेष महत्व रखती हैं, जब सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। त्योहारों के अवसर पर आपसी सम्मान और संवाद ही सामाजिक सौहार्द की असली पहचान है।

सामाजिक सौहार्द का सशक्त संदेश

होली का पर्व रंगों और खुशियों का प्रतीक है। ऐसे में एक मुस्लिम नेता द्वारा हिंदू मंदिरों के पुरोहितों को सम्मानित करना सामाजिक समरसता की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा रहा है। यह पहल इस बात का संकेत है कि धार्मिक विविधता के बावजूद आपसी सम्मान और प्रेम ही भारतीय संस्कृति की असली पहचान है।
पूर्व मंत्री आबिद रजा की इस पहल ने बदायूँ में एक नई परंपरा की शुरुआत की है। आने वाले समय में यदि अन्य जनप्रतिनिधि भी इसी भावना से आगे बढ़ें तो निश्चित ही सामाजिक एकता और भाईचारा और अधिक सुदृढ़ होगा।
पूर्व मंत्री का बयान

इस अवसर पर पूर्व मंत्री आबिद रजा ने कहा,
“होली प्रेम, भाईचारे और रंगों का पर्व है। मेरा मानना है कि सभी धर्म हमें एक-दूसरे का सम्मान करना सिखाते हैं। रमजान के पाक महीने में होली के अवसर पर मंदिरों के पुरोहितों को सम्मानित कर मैंने यही संदेश देने का प्रयास किया है कि हम सब पहले इंसान हैं, और समाज की एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।”
होली के अवसर पर दिया गया यह सम्मान केवल वस्त्र भेंट करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक व्यापक संदेश बनकर उभरा—कि त्योहार दिलों को जोड़ने का माध्यम हैं, और सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज को साथ लेकर चले।