बदायूं। उस्ताद शायर खालिद नदीम बदायूंनी के चेहल्लुम के मौके पर उनकी याद में फनकार एकेडमी द्वारा सादिक अलापुरी की रिहायशगाह पर एक नातिया महफिल का आयोजन बुजुर्ग शायर अख्तर बदायूंनी की सदारत में किया गया। जिसमें शायरों ने बेहतरीन कलाम पेश कर समा बांध दिया।


नशिस्त का आगाज हाफिज जमाल बदायूंनी ने क़ुरआन शरीफ की तिलावत से किया जिसके बाद मरहूम अल्हाज खालिद नदीम बदायूंनी के कलाम को शाकिर रजा, फैजान रजा, जमाल बदायूंनी और अबरार बदायूंनी ने अपनी बेहतरीन आवाज में सुनाकर उन्हें खिराजे अकीदत पेश की।
अध्यक्षता करते हुए बुजुर्ग शायर अख्तर बदायूंनी ने पढ़ा-
नबी ने पत्थरों को घिस के आइनों को निकाला है,
अंधेरी रात के मुंह से उजालों को निकाला है।

उस्ताद शायर डॉ मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने कहा –
हो जिसके लब पे नाते मुस्तफा, मूंह चूम लो उसका।
न उसकी मुफलिसी देखो, न उसका माल ओ ज़र देखो।।

अहमद नबी बदायूंनी ने अपने खयाल का इजहार यूं किया-
अगर अल्लाह का होना है तो फिर, रसूलल्लाह का होना पड़ेगा।

आयोजक सादिक अलापुरी ने अपनी बात यूं रखी-
मैं कैसे मान लूं कि जमाना कुछ और है, अल्लाह तो वही है ये जमाना कुछ और है।

शायर शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने अपने जज्बात यूं रखे-
हो गई जो किस्मत से हाजिरी मदीने की,
रात दिन मैं घूमूंगा हर गली मदीने की।

संचालन करते हुए युवा शायर अरशद रसूल ने यूं पढ़ा-
जो शख्स मानता है हिदायत रसूल की, जन्नत में जाएगा वो बदौलत रसूल की।

वरिष्ठ शायर समर बदायूंनी ने अकीदत यूं बयां की-
कैसे न भला मैं रहूं सरकार की तरफ,
रहते हैं सभी अपने तरफदार की तरफ।

दानिश बदायूंनी ने कहा-
या रब कुछ ऐसा कर दे तू नामे रसूल से, पहचान मेरी भी हो गुलामे रसूल से।

असरार मुज्तर बदायूंनी ने कहा-
सना करते हैं महफिल में तो ये महसूस होता है,
हमारी नात सुनने को हबीबे किबरिया आए।

अय्यूब बदायूंनी ने पढ़ा –
मुरादों का पौधा शजर हो रहा है,
दुआओं को हासिल समर हो रहा है।

इस मौके पर अम्बर बदायूंनी, साकिब बदायूंनी, ने भी कलाम पेश किए और मु० सलमान, अल्हाज इरफ़ान,शाहनवाज, शोएब शादान,काशिफ अब्दुल्ला,वाहिद आदि मौजूद रहे।
सलातो सलाम से महफिल का समापन करते हुए मरहूम खालिद नदीम बदायूंनी की मगफिरत के लिए दुआ की गई।

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