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 बदायूं। साहित्यकार द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी गई ।श्रद्धा-सुमन अर्पित किये।साहित्यकार के गुण कीर्ति का वर्णन स्मरण किया गया। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनन्दी पटेल ने एक समारोह में साहित्यकार माहेश्वरी को बच्चों के गांधी की उपाधि प्रदान दी साथ ही अपने एक भाषण में साहित्यकार द्वारिका प्रसाद की कविता का शीर्षक दिया।
” उठो सपूतो इतना ऊंचे जितना उठा गगन है।”
इसका उधारण देकर युवाओं को साहस और शौर्य प्रदान करने के साथ-साथ कवि के लेखन और ब्रज क्षेत्र के सम्मान में प्रकाश डाला।
“उठो लाल अब आंँखें खोलो,पानी लाई हूंँ मुंँह धो लो।”
कविता द्वारा कवि ने सरल सहज मातृत्व भाव के साथ-साथ एक जागृति का संदेश भी दिया है । ऐसे रचनाकार को नमन करती मेरी लेखिनी यूं तो कुछ लिखने में सक्षम नहीं पर अति लघु रूप से रूपायित करती हूं।द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म एक दिसंबर 1916 में जनपद आगरा के गांव रोहता में हुआ था। जिनका 29 अगस्त 1998 को प्रयाण दिवस मनाया जाता हैं।
उनकी शिक्षा सचिव,से लेकर निदेशक तक प्रयागराज के साथ कई अन्य स्थानों पर हुई। से.नि.पश्चात आगरा रहने लगे। उनकी शिक्षा-दीक्षा गृह जनपद आगरा में हुई।
एक से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए 26 पुस्तकें प्रकाशित की गई। युवाओं के साहस,शौर्य,बल और बुद्धि वृद्धि में वरीयता हेतु, सामाजिक व साम्प्रदायिक सौहार्द्र, समरसता,सकारात्मक प्रेरणास्पदता ,युगानुकूल प्रासंगिकता ,जन पीड़़ा की प्रखरता,देश-प्रेम, वीरता, प्रकृति, समाजों में व्याप्त अन्यायों और कुरीतियों की असम्बद्धता को दूर करने की प्रेरणा से 14 से अधिक अन्य पुष्तकें और अपनी जीवनी ,इस तरह चालीस से अधिक पुस्तकें आपने लिखीं। जिसमें शैशव से युवा और हर क्षेत्र में उनका सहज सरल लेखन हृदय पर अपनी छाप छोडता है । वे इतना सटीक लिखते थे कि कभी-कभी उनका लेखन विज्ञापन तक बन जाता था ।
1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला
1977 में उ.प्र.हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई जी द्वारा
दिया गया ।
1992 में उ.प्र.हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा बाल साहित्य भारती सर्वोच्च पुरस्कार से नवाजा गया।
1982 में पद्मश्री पुरस्कार ( साहित्य व अन्य सेवा क्षेत्रों का केन्द्रीय उच्चस्थ पुरस्कार )तथा अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
शिक्षा और कविता को समर्पित द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की कविता का सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार कृष्ण विनायक फड़के पर इतना प्रभाव था कि अपनी अंतिम इच्छा के रूप में प्रकट किया कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी शवयात्रा में माहेश्वरी का बालगीत
“हम सब सुमन एक उपवन के*’ गाया जाए।
फड़के का मानना था कि अंतिम समय में भी पारस्परिक एकता का संदेश दिया जाना चाहिए। और ऐसा किया भी गया।
प्रोफेसर डॉ. कमला माहेश्वरी कमल ने कहा कि ऐसे युगचेता को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर अपनी भाविक ,काव्यात्मक हार्दिक श्रद्धांजलि विनत हो अर्पित करती हूँ ।

चेता थे युग चेतना
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चेता थे युग-चेतना , दृष्टा थे भवितव्य ।
कालजयी थी लेखिनी,बात्सल्य रस भव्य ।।
बात्सल्य रस भव्य , महत्ता दी जन पीड़ा।
प्रासंगिक ले प्रश्न, हरी सामाजिक व्रीड़ा ।।
साहस शौर्य हितार्थ ,बने जो पूर्ण अचेता ।
दिये बना सब युवा , प्रेरणा देकर चेता ।।
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व्यक्तित्व रहा अति रोचक था,पर वे स्वदेश बलिहारी थे।
वे त्याग आँग्लमय काव्य,हिन्द संस्कृति वाले उपचारी थे।
इस हेतु लिखीं ख़ुद,लिखवाईं, भारती शान ना घटने दी,
बच्चों को दें हम संस्कार, संस्कृति निज के व्यवहारी थे।।
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सामाजिक समरसता पौषक,वे सहज ज्ञान-विज्ञानी थे ।
*एवार्ड पद्मश्री* प्राप्त किया,पा सार्थक वाणी दानी थे ।
हो क्षेत्र भले बच्चों वाला, या हो शैतानी शौर्य हीन ,
सबको मधुरिम वाणी बाँटी ,वे जीवन कला निशानी थे ।।
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तन मृण्मय से तुम भले गये चिन्मय जगती में हो जीवित
आबालबृद्ध की वाणी में , तुम चेतनता से हो पौषित ।
तुम उठो लाल आंँखें खोलो,पानी लाई कहने वाले ,
सोते को जागृति देते थे, तुम ज्ञान कोष हो संचारित ।।
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अर्पित करती श्रद्धांजलि हूँ ,नत हो भावों के पुष्पों से ।
सामाजिकता के अग्रदूत , हर क्षेत्र में मैं गुलदस्तों से ।
तुम देश प्रेम ,तुम धीर-वीर ,प्रकृति के चारण कर्ता थे ,
हारे थे कब तुम तो मन से, तुम जीते साधक हस्तों से ।। इसके अलावा साहित्यकार के द्वारा अनेक रचनाएं लिखी गई।

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